इरफ़ान को हम सब से जुदा हुए छह साल का अरसा हो गया, लेकिन आज भी यह लगता है कि वे हमारे बीच ही कहीं मौजूद हैं। हों भी क्यों न! वे अपनी फ़िल्मों, टेली सीरियल और तमाम इंटरव्यू में हमेशा ज़िन्दा रहेंगे। उनकी ना-मौजूदगी हमें कभी महसूस नहीं होगी। ऐसे लोग कभी मरते भी नहीं, यह ला—फ़ानी होते हैं।
इरफ़ान को ज़िन्दा रखने का काम वे किताबें भी करती रहेंगी, जो उन पर लिखी गई हैं। ऐसी ही एक नायाब किताब हाल ही में आई है, ‘इरफ़ान जहॉं ले चले हवा’। इरफ़ान की बे—मिसाल अदाकारी के शैदाइयों के लिए, तो यह जैसे एक बेश—क़ीमती तोहफ़ा है। किताब ‘कॉपर कॉइन पब्लिशिंग’ ने प्रकाशित की है। कहने को यह इंटरनेशनल फ़िल्म डायरेक्टर अनूप सिंह का दिल को छू लेने वाला संस्मरण है, लेकिन उन्होंने इसे एक नॉवेल की तरह बुना है।
अपने आगाज़ से ही यह किताब पाठकों को अपने आगोश में ले लेती है। ज़बान से लेकर इसका प्रजेंटेशन कमाल का है। अनूप सिंह ने इरफ़ान के संग दो फ़िल्में ‘क़िस्सा—द टेल ऑफ़ अ लोनली गोस्ट’ और ‘द सॉन्ग ऑफ़ स्कॉर्पियन्स’ की हैं। ज़ाहिर है कि उनका काफ़ी समय इरफ़ान के साथ बीता है। और यही यादें किताब में बिखरी हुई हैं।
किताब की शुरूआत स्विट्ज़रलैंड में अनूप सिंह को मोबाइल में मिले इरफ़ान के इंतिक़ाल के मैसेज से होती है, जो कि दो साल ज़िन्दगी और मौत के बीच जूझते हुए, इस दुनिया को अलविदा कह गए। इरफ़ान के गैस्ट्रोइंटेस्टनल सिस्टम में मलिग्नंट एंडोक्राइन ट्यूमर्स था। यानी एक तरह का जानलेवा कैंसर। इस मैसेज के बाद यादों का एक सिलसिला शुरू होता है, जिसमें इरफ़ान की पूरी शख़्सियत और अदाकारी के जानिब उनका हद दर्जे का जुनून, डेडिकेशन सामने आता चला जाता है।
छोटे—छोटे वाक़ि’आत को अनूप सिंह ने क़लमबंद किया है। और यह वाक़ि’आत बेहद दिलचस्प और दिल को लुभाने वाले हैं। लिखने का अंदाज़ कुछ—कुछ शायराना है। यह सीधा—सादा संस्मरण नहीं, इसमें लेखक के जज़्बात की शिद्दत है, लेकिन मरकज़ में हैं—इरफ़ान। एक पल को भी वे अपने आप से उन्हें ओझल नहीं करते। एक क़िस्से की तरह उन्होंने अपनी यादों को तरतीब दिया है।
अनूप सिंह ने इरफ़ान को कैसे अपनी फ़िल्म ‘क़िस्सा—द टेल ऑफ़ अ लोनली गोस्ट’ के लिए राज़ी किया और किस तरह से उन्होंने अपने आप को फ़िल्म के अहम किरदार अंबर सिंह के तौर पर ढाला, किताब में विस्तार से इसका ज़िक्र है। इरफ़ान एक स्पोंटेनियस अदाकार थे, जो लगातार अपनी अदाकारी को इम्प्रोवाइज किया करते थे। जब कोई रोल करते, उसमें वे बिल्कुल डूब जाते।
किताब में इस बात का कई जगह ज़िक्र है कि डायरेक्टर अनूप सिंह जो भी तसव्वुर करते, जो उनके ज़हन में चल रहा होता, इरफ़ान उसे अपनी जानदार अदाकारी से पेश कर देते। अपने किरदार में डूब जाना जैसे उनकी फ़ितरत थी। और यही उनकी कामयाबी का राज़ भी।
एक जगह अनूप सिंह लिखते हैं, ”इरफ़ान के बुनियादी, अदायगी से जुड़े चुनावों ने उसके अभिनय की नैतिकता को निजी से विराट में बदल दिया था। उसकी अदायगी न सिर्फ़ पात्र की अनकही तरंगों को बल्कि ख़ुद फ़िल्म को आकार देने लगी थी।”(पेज—81) ‘क़िस्सा—द टेल ऑफ़ अ लोनली गोस्ट’ और ‘द सॉन्ग ऑफ़ स्कॉर्पियन्स’ फ़िल्म में इरफ़ान की शानदार अदाकारी अगर देखें, तो फ़िल्म डायरेक्टर अनूप सिंह और उनके बीच आपसी अंडरस्टैंडिंग, ट्यूनिंग या यूॅं कहें केमिस्ट्री का ही नतीजा है।
इरफ़ान के लिए अनूप सिंह, ‘अनूप साब’ थे, तो सिंह उन्हें हमेशा ‘जनाब’ कह कर सम्बोधित करते थे। उनकी नज़र में ‘इरफ़ान, बयान से परे और अथाह थे।’ जिन लोगों ने इरफ़ान की अदाकारी देखी है, वे इस बात से इत्तिफ़ाक़ ही जताएंगे।
किताब कई छोटे—छोटे अध्यायों में बॅंटी हुई है। अनूप सिंह एक मंझे हुए क़िस्सा—गो की तरह अपनी यादों को पाठकों से साझा करते हुए आगे बढ़ते हैं। इसमें कुछ उपाख्यान भी हैं, जो कि बेहद रोचक और भावुक करने वाले हैं। मसलन पगड़ी बॉंधने वाले एक साधारण इंसान पम्मी की असाधारण प्रेम कहानी, जो अपनी बीवी की मुहब्बत में पूरी तरह गिरफ़्तार है। टूरिस्ट गाइड मोती ख़ॉं, जिसके पास हिन्दुस्तान भर के बिच्छुओं का संग्रह है। बिच्छुओं का एक्सपर्ट मोती। पंजाब की सूफ़ी गायिका ज्योति नूरॉं का क़िस्सा।
लेखक ने छोटे—से एक इशारे भर से बहुत कुछ बयॉं कर दिया है। हमारे समाज में पितृसत्तात्मक जड़े कितनी गहरी हैं कि कामकाजी औरतें भी अपनी ज़िन्दगी के अहम फ़ैसले नहीं ले पातीं। शौहर के इशारों पर ही उन्हें चलना होता है। लेखक की नज़र हर उस पहलू की ओर जाती है, जो कि एक संवेदनशील इंसान को परेशान करती है। एक दिलचस्प क़िस्सा जैसलमेर में बैल से भिड़ंत का भी है, जिसमें हॅंसी—हॅंसी में अनूप सिंह और इरफ़ान की जान पर बन आयी थी।
हक़ीक़त में घटी यह एक ऐसी कहानी है, जो फ़िल्मी लगती है। ‘द सॉन्ग ऑफ़ स्कॉर्पियन्स’ की शूटिंग के दौरान एक और वाक़िआ घटता है, जब फ़िल्म की पूरी यूनिट पचास से ज़्यादा सारस से घिर जाती है। सारस का यह झुंड उन पर धावा बोल देता है। इरफ़ान की अक़्लमंदी से उनसे किसी तरह छुटकारा मिल पाता है। इतना सब हो जाने के बाद भी इरफ़ान ज़िन्दादिल बने रहते हैं। ख़तरों से खेलने में उन्हें मज़ा आता है। ज़िन्दा—दिली से वे उस वक़्त भी दूर नहीं हुए, जब वे अस्पताल में ज़िन्दगी और मौत के बीच झूल रहे थे।
उन्हें सब कुछ मालूम था, लेकिन उन्होंने आख़िरी समय तक उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा था। किताब में एक जगह इरफ़ान के हवाले से दर्ज है, ”मौत के बहुत सारे चेहरे हैं, अनूप साब। वे मेरा मन बहलाते रहते हैं, और मैं बेहतर ढंग से सॉंस लेने लगता हूॅं और दर्द तक को भूल जाता हूॅं। मौत के अनेक चेहरे। बहुत सारे। कभी—कभी वह एक रौशनी होती है, थोड़ी—सी पीली और नीली। कभी—कभी कोहरा। बहुत—से सपने। बहुत—से सपने।’
अफ़सोस, ऐसे बहुत से सपने इरफ़ान पूरे नहीं कर पाए। तिरेपन साल की कम उम्र में ही वे हमसे हमेशा के लिए बिछड़ गए। किताब के आख़िरी अध्याय भावुक कर देने वाले हैं। लेखक ने इरफ़ान के आख़िरी दिनों को बड़े ही शिद्दत से याद किया है। उसे बयान करने का लहज़ा कुछ ऐसा है कि आँखें भीग जाएं, ”उसने कहा था, नहीं कहा था क्या, कि चूॅंकि हम ऊर्जा हैं, हम कभी नहीं मरते। हम इस क़ायनात की शाश्वत ऊर्जा का हिस्सा हैं। उसने इन्हीं शब्दों में मुझे सूफ़ी मंसूर अल—हल्लाज के ‘अनल हक़’ का मानी समझाया था।
‘मैं सच हूॅं।’ हम सब सच हैं। कट्टरपंथियों ने समझा कि वह स्वयं को ईश्वर घोषित कर रहे हैं, जबकि अपने भव्य आनंद में उन्होंने केवल इतना कहा था कि वे ब्रह्मांड का एक हिस्सा हैं। हम सब क़ायनात का हिस्सा हैं”
‘इरफ़ान जहॉं ले चले हवा’ का प्रीफ़ेस सुपर स्टार अमिताभ बच्चन ने लिखा है। इरफ़ान को अपनी ख़िराजे—अक़ीदत पेश करते हुए अमिताभ लिखते हैं, ”इरफ़ान एक नया सूरज था, जो बहुत जल्द अस्त हो गया।” इरफ़ान की अदाकारी की ख़ूबियों को बयॉं करते हुए वे आगे लिखते हैं, ”उनके अभिनय में एक पकड़ में न आने वाली ख़ूबी थी, जो किसी भी दर्शक को बेचैन कर सकती थी। फ्रेम के भीतर उसका होना ही देखने वाले को अनायास नफ़ीस अक़्लमंदी के घेरे में लाकर खड़ा कर देता था। कहीं का भी न होने का एहसास।
मुझे लगता है कि इरफ़ान की नफ़ासत को स्क्रिप्ट्स या डायलॉग्स की ज़रूरत नहीं थी। उनका ज़बरदस्त जोश ही उनकी पुर—सुकून शैली की भूमिका तैयार कर देता था।”
अपनी इसी ख़ूबी के बदौलत इरफ़ान ने अपनी फ़िल्मों के निभाए किरदारों की रूह को अच्छी तरह जाना—समझा और सहजता से पेश किया। ‘स्लमडॉग मिल्यनेर’, ‘मक़बूल’, ‘लंच बॉक्स’, ‘हिन्दी मीडियम’, ‘पान सिंह तोमर’ और ‘पीकू’ फ़िल्मों में निभाए उनके ला—जवाब किरदार कभी कोई भुला नहीं पाएगा। ‘इरफ़ान जहॉं ले चले हवा’ बुनियादी तौर पर अंग्रेज़ी में लिखी गई है।
दरअसल, यह ‘इरफ़ान : डायलॉग्स विथ द विंड’ का हिन्दी अनुवाद है। लेकिन किताब पढ़ने पर ज़रा-सा भी एहसास नहीं होता कि यह अंग्रेज़ी में लिखी गई है। मदन सोनी और रीनू तलवाड़ ने इसका ब—ख़ूबी हिन्दुस्तानी ज़बान में तर्जुमा किया है। किताब का कवर पेज़, छपाई और प्रोडक्शन आकर्षक है। अगर आप बेहतरीन अदाकार और संजीदा इंसान इरफ़ान को क़रीब से जानना और शिद्दत से महसूस करना चाहते हैं, तो किताब ‘इरफ़ान जहॉं ले चले हवा’ ख़ास आपके लिए ही है।
किताब समीक्षा : ‘इरफ़ान जहॉं ले चले हवा’
लेखक : अनूप सिंह
अनुवाद : मदन सोनी और रीनू तलवाड़
प्रकाशन : ‘कॉपर कॉइन पब्लिशिंग’ गाज़ियाबाद
मूल्य : 399 रुपए
पृष्ठ : 240